Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
नैवात्मानं न चाकाशं न शून्यं न च वेदनम् ।
अत्यन्तपरिणामेन पश्यन्पश्यति तत्पदम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब सप्तम भूमिका की स्थिति से वह किस तरह का होता है, इसे बतलाते हैं /
तत्त्वज्ञानी पुरुष सप्तम भूमिका में स्थिति कर न आत्मा को, न आकाश को, न शून्य को,
न वृत्ति को देखता है, किन्तु केवल आत्मपद को ही (ब्रह्मरूपता को ही) देखता है