Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 44
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- Verse 1तैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त चौवालीसर्वों सर्ग समाधिरूपी कल्पद्रुम को हर तरह से बोना चाहिये, त…
- Verse 2कहा : हे श्रीरामजी, सुनिये, मैं आपसे ऐसे समाधिरूपी वृक्ष का वर्णन कर रहा हूँ, जो विवेकीजन…
- Verse 3शत्रुओं तथा सगे-सम्बन्धियों द्वारा हुए अपमान आदि से जन्य दुःख से या भाग्यवशात् अपने- आप…
- Verse 4हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्त को ही विद्वान लोग इस बीज का खेत बतलाते हैं, जो शुभकर्मसमूहरूपी…
- Verse 5यह संसार का परम वैराग्यरूप समाधि का बीज विवेकीजनरूपी जंगल में विवेकज्ञान से परिष्कृत चित्…
- Verse 6अपनी चित्तरूप भूमि में गिरे हुए पूर्वोक्त वैराग्यरूपी समाधिबीज को बढाने की इच्छा से दृढ़…
- Verses 7–8सर्वप्रथम बुद्धिमान पुरुष को सज्जनो की संग्रतिऊपी नवीन क्षीर से, तदनन्तर शाख़रूपी अमृत से…
- Verse 9संसार को त्याग देने की प्रबल इच्छारूप समाधिवीज को अपनी चित्तरूपी भूमि में गिरे जानकर बुद्…
- Verse 10वे यत्न कौन हैं; इस पर कहते है/ कायिक, वाचिक तथा मानसिक तप एवं दान से और अभिमान आदि से शू…
- Verse 11इस तरह सींचने आदि के बाद बीज में जब अंकुर पैदा हो जाय, तब इसकी रक्षा के लिए अत्यन्त निपुण…
- Verse 12तदनन्तर पूर्ववासनाओं में स्थित आशारूपी विहंगों, आत्मा से भिन्न पुत्र, मित्र, आदि में अनुर…
- Verse 13अहिसाप्रधान होने से अत्यंत कोमल, यम, नियम, प्राणायाम, ईश्वरोपासनादि सतक्रियारूपी झाड़ओं स…
- Verse 14भोगों द्वारा क्षणभंगुर तथा तरंगों के समान चंचल, दुष्कृतरूपी मेघों से प्राप्त सम्पत्ति ओर…
- Verse 15इसलिए धैर्य, औदार्य तथा दया आदि यत्नो से एवं जप, स्नान, तप और दम आदि के द्वारा प्रणव के अ…
- Verse 16इस तरह से रक्षित इस ध्यान के बीज से विवेकनामक नवीन अंकुर उत्पन्न होता है, जो अत्यन्त पुष्…
- Verse 17जैसे अभिनव चन्दमा से आकाश सुन्दर प्रतीत होता है वैसे ही उस विवेक नामक नवीन अंकुर से आत्मप…
- Verse 18हे श्रीरामचन्द्रजी, उस अंकुर से दो पत्ते अपने-आप निकलते हँ । जिनमें एक का नाम तो वेदान्तश…
- Verse 19आगे चलकर यह अंकुर सन्तोषरूप त्वचा से वेष्टित तथा वैराग्यरूपी रससे रंजित हो काण्ड, दृढमूलत…
- Verse 20शास्त्रार्थरूपी वर्षा का जल पाकर वैराग्यरूपी रस से जब इसकी आत्मा खूब पुष्ट हो जाती है तब…
- Verse 21वेदान्तशास्त्र के विचार, साधुओं की संगति तथा वैराग्यरूपी रस से जब यह खूब मोटा हो जाता है…
- Verse 22तदनन्तर विज्ञान से अलंकृत आकारवाले उस विवेक से आत्मरस से विलास करनेवाली एवं बहुत दूर देश…
- Verse 23स्वात्मतत्त्व का स्पष्ट आविर्भाव, एकमात्र उसीकी सत्यता, आत्मस्वरूप में स्थिति, धीरता, निर…
- Verse 24यशरूपी पुष्पों तथा शान्ति आदि गुणरूपी पत्तों से शोभित इन लताओं से परिपुष्ट ध्यानरूप वृक्ष…
- Verse 25हे श्रीरामजन्द्रजी, लता, पल्लव तथा पुष्पों से सुशोभित इस तरह का यह उत्तम ज्ञानरूपी वृक्ष…
- Verses 26–27यशरूपी पुष्पों के गुच्छं से भरा, गुणरूपी पत्तों के विलास से भूषित, वैराग्यरूपी रससे विस्त…
- Verse 28जैसे मेघ छाया का विस्तार करता है वैसे ही यह भी शमतारूपी छाया का विस्तार करता है और शम भी…
- Verse 29आत्मज्ञान के मूलबन्ध को यह अपने से ही ऐसे बाँध देता है, जैसे कुलाचलपर्वत स्थित अपने मूल क…
- Verses 30–31पुरुष के दुश्यरूपी जंगल में छाया के वितान से वेष्टित इस विवेकरूपी कल्पवृक्ष के दिन-दिन बढ…
- Verses 32–33अनेक जन्मों के नानाविध दुःखों से जीर्ण, दैवात् सन्मार्ग प्राप्त हो जाने पर भी नाना वादिय…
- Verse 34एकमात्र सत्ता ही जिसकी आत्मा है ऐसे पुरुषरूपी चमड़े का अपहरण करने के लिए काम, क्रोध आदि छ…
- Verse 35यह मनरूपी मृग अनेक प्रकार के भोगो में आदर रखनेवाला है, थोड़े में कभी सन्तुष्ट नहीं रहता ।…
- Verse 36सम्पत्तिरूपी लताओं में पैर फेस जाने से जब यह उठकर भागना चाहता है तब पुनः लड़थड़ाकर गिर पड…
- Verse 37अनेक व्याधिरूपी दुष्ट व्याधो के दुःखों से पलायन में तत्पर यह मृग दैव की संभावना से रहित ह…
- Verse 38नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों के आस्वाद के विषय गीतों, घण्टा के शब्दों तथा जव आदि अंकुरों के…
- Verse 39स्वर्ग, नरक आदिरूप ऊँचे-नीचे स्थानों में क्रमशः चढ़ने- गिरने से इसके मस्तक में चक्कर आ गय…
- Verse 40तृष्णारूपी सुन्दर लताओं में छिपते रहने से इसका शरीर घावयुक्त हो गया है । इसने अपनी बुद्धि…
- Verse 41यह इन्द्रियरूपी गाँव में आकर भागने में तत्पर हे । जिसको वश में कर लेना कोई लड़कों का खेल…
- Verse 42विषयरूपी अजगरो के भयानक विषरूपी फुफकार से यह मूर्छित हो गया है तथा कामिनीरूपी भूमि में का…
- Verse 43क्रोधरूपी दावाग्नि से यह जल गया है । यही कारण है की इसकी पीठ पर मानों फोड़ा हो जाने से इस…
- Verse 44अपनी आत्मा में संलग्न अनेक अभिलाषारूपी मच्छर इसे काट-खाते हैं और यह भी उनके भय से वेगपूर्…
- Verse 45यह तो अपने ही कर्म ओर कर्तृता के फर में पड़कर उद्भ्रान्त हो गया है, फिर भी एक दारिद्रयरूप…
- Verse 46मानरूपी सिंह के समुल्लास से इसके हृदय में उत्कम्पन हो रहा है इसकी छाती धडक रही है, ओर उसस…
- Verse 47निर्जन जंगल में गर्वरूपी अजगर इसको शीघ्र निगल जाने के लिए चिरकाल से प्रतीक्षा कर बैठा हे…
- Verse 48स्त्री के लिए बने हुए युवावस्थारूपी प्रियमित्र ने क्षणभर इसका आलिंगन कर इसे फिर छोड दिया…
- Verse 49हे राजन्, इस तरह का यह मनरूपी मृग अनेक जन्मों के संचित पुण्य के उदय से कभी अधिकारी शरीर…
- Verse 50हे श्रोताओं, ताली, तमाल, बकुल आदि वृक्षो के मूल के नीचे प्राप्त होनेवाले विश्रामो के सदृश…