Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
आजीवमुद्यदुत्सेधं विवेकिजनकानने ।
पत्रपुष्पफलोपेतं समाधानतरुं शृणु ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
कहा : हे श्रीरामजी, सुनिये, मैं आपसे ऐसे समाधिरूपी वृक्ष का वर्णन कर रहा हूँ, जो विवेकीजनरूपी
जंगल में पैदा हुआ है, जिसकी ऊँचाई अभी भी बढ़ती ही जा रही है, जो अपने पत्र, पुष्प एवं फलों
से खूब लदा है ओर जो विवेकी पुरुषों को सब तरह से जीवन प्रदान करनेवाला है