Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
शुभजालहलाकृष्टं रसासिक्तमहर्निशम् ।
प्रवहच्छ्वसनाकुल्यं क्षेत्रमस्य विदुर्बुधाः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्त को ही विद्वान लोग इस बीज का
खेत बतलाते हैं, जो शुभकर्मसमूहरूपी हलों से खूब जोता गया है, शान्ति आदि जल से रात-दिन
खूब सीचा गया है तथा निरन्तर बह रहे प्राणायामरूपी नहर से जो युक्त है