Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
तालीतमालबकुलादिकवृक्षगुल्मविश्रान्तिषु प्रचुरपुष्पविलासहासैः ।
नामापि यस्य न विदन्ति सुखस्य मूढाः प्राप्नोति तच्छमतरोः स्वमनोमृगो वः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रोताओं, ताली, तमाल, बकुल आदि वृक्षो के मूल के नीचे प्राप्त होनेवाले विश्रामो के सदृश
भूलोक से लेकर सत्यलोकपर्यन्त के निवासो मे प्रचुर फूलों के विलासरूपी हासों के सदृश अनित्य
भोगआभासों के निमित्त यानी उनमें फंसे रहने के कारण जिस निरतिशय भूमानामक सूख का नाम
भी आत्मज्ञान -शून्य लोग नहीं जानते, ऐसे पुनर्जन्म से शून्य मोक्षनामक विश्रान्तिसुख को आपका
अपना मनरूपी मृग उस ध्यानरूपी कल्पवृक्ष के ही नीचे आकर प्राप्त कर सकता है, जिसका मैंने
अभी आप लोगों से वर्णन किया है