Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verses 26–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, verses 26–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 26,27
संस्कृत श्लोक
यशःकुसुमगुच्छाढ्यो गुणपल्लवलासवान् ।
वैराग्यरसविस्तारी प्रज्ञामञ्जरिताकृतिः ॥ २६ ॥
सर्वाः शीतलयत्याशाः प्रावृषीव पयोधरः ।
सर्गातपं शमयति सूर्यतापमिवोडुपः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
यशरूपी पुष्पों के गुच्छं से भरा, गुणरूपी पत्तों
के विलास से भूषित, वैराग्यरूपी रससे विस्तार को प्राप्त तथा प्रज्ञारूपी मंजरियों से अलंकृत यह
(४) शाखा-प्रशाखाओं के रूप में फैलकर बहुत दूर देशतक जानेवाली यह साधारण अर्थ हे ।
इसका विशेष अर्थ "अपरिच्छिन्न आत्म-प्रदेश में जानेवाली है ।
समाधिरूपी वृक्ष सारी दिशाओं को ऐसे शीतल कर देता है जैसे कि वर्षा ऋतु में मेघ, एवं सांसारिक
ताप को ऐसे शान्त कर देता है, जैसे कि सूर्य के ताप को चन्द्रमा