Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
गर्वेण गिरणायाशु दूरतोजनसेवितः ।
कामैः समन्ततो दन्तवितानितयवाङ्कुरः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
निर्जन जंगल में गर्वरूपी अजगर इसको
शीघ्र निगल जाने के लिए चिरकाल से प्रतीक्षा कर बैठा हे । नानाविध कामनाओं की सिद्धि के लिए
चारों ओर अपनी दीनता प्रकटकर भीख मांगने के निमित्त इसने दाँतों रूपी मानों जव के अंकुर
फैला रक्खे हे