Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
कोपदावानलप्लुष्टपृष्ठविस्फोटदाहवान् ।
सदा गतागतानेकदीर्घदुःखप्रदाहवान् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
क्रोधरूपी दावाग्नि से यह जल गया है । यही कारण है
की इसकी पीठ पर मानों फोड़ा हो जाने से इसे बाहर दाह हो रहा है । और हे श्रीरामजी, विषयों में
बार-बार भ्रमण करते रहने से अनेक तरह के चिन्तारूपी दुःखों से इसके भीतर भी भारी दाह उठ
रहा है