Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
क्रमात्समाधानतरोराजीवफलशालिनीम् ।
सलताकुसुमां ब्रूहि सत्तां विश्रान्तिदां मुने ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
तैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त
चौवालीसर्वों सर्ग
समाधिरूपी कल्पद्रुम को हर तरह से बोना चाहिये, ताकि उसके नीचे
जीव का श्रान्त मनरूपी मृग अच्छी तरह विश्रान्ति पा सके, यह वर्णन
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुने, समाधिरूपी वृक्ष की सत्ता का (स्थिति का) क्रमशः वर्णन
कीजिये, जो विवेकी पुरुषों के जीवन के उपयोगी सब तरह के फलों से सुशोभित है तथा जो लता,
पुष्प आदि से युक्त मनरूपी मृग को विश्रान्ति प्रदान करनेवाली है