Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, verse 38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
ज्ञेयास्पदसमायातदुःखसायकशङ्कितः ।
वैरिविद्रवणव्यग्रो दृषदाहरणाङ्कितः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियों के आस्वाद के विषय गीतों, घण्टा के शब्दों तथा जव आदि अंकुरों
के निमित्तभूत व्याधो के खेत आदि से उत्पन्न दुःखरूपी बाणो से शंकित, काम, क्रोध आदि शत्रुओं
के आक्रमण से व्यग्र तथा पत्थरों के प्रहारो के तुल्य पूर्व -पूर्वकाल के दुःखों के अनुभवरूप संस्कारों
से युक्त यह मनरूपी मृग है