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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

तपःप्रकारदानेन पदार्थघटनेशितैः । तीर्थायतनविश्रान्तिवृतिविस्तारकल्पनैः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

वे यत्न कौन हैं; इस पर कहते है/ कायिक, वाचिक तथा मानसिक तप एवं दान से और अभिमान आदि से शून्य पदार्थों के संघटन से समर्थित पुण्यमय तीर्थ स्थानों में निवासरूपी वृत्ति के विस्तार की नानाविध कल्पनाओं से इस बीज की रक्षा करना चाहिए