Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 184
32 verse-groups
- Verses 1–4घर से बाहर निकलना ही संभव नहीं है वह सप्तद्वीपाधिश्वररूप से दिग्विजय कैसे कर सकता है ? जि…
- Verse 5एक ही फल वर और शाप दोनों का फल हो यह कठिन ही नहीं असंभव है, ऐसा कहते हैं। वर और शाप की फल…
- Verses 6–7गौरी-आश्रम के तपस्वी ने कहा : हे साधो, इनका क्या असमंजस देखते हो । इसके बाद इनकी जो घटना…
- Verse 8तदुपरान्त क्रमशः वे आठों भाई घर पर मरेंगे। तब उनके बन्धु बान्धव उनके शरीरों को उनके द्वार…
- Verse 9पृथक् पृथक् स्थित उनके वे जीव जड़ों की नाई मुहूर्तभर सुषुप्ति में स्थित रहेंगे
- Verses 10–11कर्मो के विरोध का परिहार कहने के लिए उपक्रम करते हैं। इसी बीच में उनके वे वरशापरूप कर्म फ…
- Verses 12–13वर ओर शापो का स्वरूप कहते हैं। यहाँ पर वे वर सुन्दर, कमल हाथ में लिये हुए, ब्रह्मदण्डरूपी…
- Verse 14वहाँ शाप तीन नेत्रवाले, शूलहाथ में लिये हुए, भयानक, काले बादल से शरीरवाले, दो हाथों से यु…
- Verse 15शाप कहेंगे : हे वरों, आप लोग दूर चले जाओ | ऋतुओं की तरह हमारा समय आ गया है उसे उल्लंघन कर…
- Verse 16वर कहेंगे : आप लोगों का निर्माण मुनिजी ने (दुर्वासा) किया है और हमारी रचना सूर्य ने की है…
- Verses 17–18वरों के ऐसा कहने पर क्रोध से झुँझलाये हुए शापों ने, “आप लोगों की सृष्टि सूर्य ने की और हम…
- Verse 19शापरूपी शत्रु के त्रिशूल उठाने पर उनका उपहास कर रहे वे सम्यक् विचार द्वारा निश्चित अपने…
- Verses 20–21हे शापों, दुष्टता (अनुचितकारिता) का त्यागकर कार्य का अन्त विचारो । कलह के अन्त में जो कुछ…
- Verse 22शापो ने वरो का वचन सुनकर “बहुत अच्छी बात है" यों उनकी सलाह मान ली। चाहे मूढ ही क्यों न हो…
- Verse 23तदनन्तर शाप वरों के साथ ब्रह्मलोक में जायेंगे । सदा ही सन्देह की निवृत्ति करने के लिए महा…
- Verses 24–26वे ब्रह्माजी को प्रणाम कर आपस में जो तकरार हुई थी उसे सब ज्यो -की-त्यों कहेंगे उनका कथन स…
- Verse 27ब्रह्माजी ने कहा : हे वराधिपों ओर शापाधिपों, जो अन्तः सारवान हैं वे जीतेंगे इसलिए आप लोग…
- Verse 28शाप कहेंगे : हे प्रजापते, चूंकि हम लोग अन्तःसारवान् नहीं हैं इसलिए हम ही वरों द्वारा जीत…
- Verse 29भगवन्, ये वर ओर शापरूप हम लोग सदा संविन्मयही हैं। हमारा स्वरूप संवित् के सिवा दूसरा नही…
- Verse 30वरदाता की “मेने वर दिया" इस तरह स्थित जो संवित् है वही वर-प्रार्थी में 'मैंने यह वर पाया…
- Verses 31–33वर का फल सुखभोगायतन देह विज्ञप्तिमात्र स्फुरण ही है, इसलिए वह विज्ञप्ति ही देहाकार बनकर द…
- Verse 34जब वर देनेवाले ओर वर प्रार्थी पुरुषों द्वारा वर देनेवालों के वरप्रदान का चिरकाल तक अभ्यास…
- Verses 35–36शास्त्रीय होने के कारण शुद्ध संविदोंमें से अतिविशुद्ध जो संवित् होती है वही सबसे प्रबल ह…
- Verses 37–38ज्येष्ठ होने के कारण वरसंवित् की प्रबलता है, ऐसा कहते है। क्षणांश से भी जो श्रेष्ठ है उस…
- Verse 39जहाँ पर एक काल में भिन्न देश मे भोग्य समान बलवाले वर ओर शाप होते हैं वहाँ पर विपश्वित् उ…
- Verses 40–44जैसे दृष्टि तिमिररोग के हट जाने पर आकाश में भ्रान्तिकृत केशों का वर्तुलाकार गोला कहीं चला…
- Verse 45ब्रह्माजी ने कहा : हे सप्तद्वीपेश्वर बनानेवाले वरों, और हे घर में रोकनेवाले वरों, आप सब ल…
- Verse 46हम सब लोगों की अभिलाषा कैसे सम्पन्न हुई ऐसी आशंका होने पर कहते हैं। आप लोग इस परस्परअपेक्…
- Verses 47–49हे वरो, देह छूटने के बाद ही ये सब लोग अपने घरों में सप्तद्वीपेश्वर बन गये हैं। सब वर कहें…
- Verses 50–51स्वप्न के समान ही यह अविरुद्ध है, यों उत्तर देते है। ब्रह्माजी ने कहा : हे वरों, चूँकि आप…
- Verses 52–58जगत् की स्वप्नतुल्यता का प्रदर्शन करते हुए पूर्वोक्त बात को स्पष्ट करते है । मृत्यु के ब…
- Verses 59–70अधिपति बनकर सन्तुष्ट होंगे । विशाल बुद्धिवाले वे जिनका पूर्वोक्त वररूप क्रियार्थ पूर्णरूप…