Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रैकात्मसारत्वाद्यथा संवेदनं स्थिताः ।
निःस्पन्दा निर्मनस्काराः स्फुरन्ति द्रव्यशक्तयः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माजी ने कहा : हे वराधिपों ओर शापाधिपों, जो अन्तः सारवान
हैं वे जीतेंगे इसलिए आप लोग आपस मे कौन अन्तःसारवान् हैं यह स्वयं अवश्य अन्वेषण करे । यह सुनकर
वरों के हृदयो में शाप ओर शापो के हृदया मे वर सारता देखने के लिए प्रविष्ट होंगे २५, २६॥ वे परस्पर
टटोलकर स्वयं हृदय-सारता को जानकर ब्रह्माजी से परस्पर एकमत्यरूप मेल से कहेंगे