Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 37–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verses 37–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
ज्योतिर्मयं विवृत्तं तु धारासाराम्बरीकृतम् ।
युगसंवत्सराद्यात्म कालचक्रं प्रवर्तते ॥ ३७ ॥
भूतलैकान्तराब्ध्यद्रिसंनिवेशः स्थितायते ।
भावाभावग्रहोत्सर्गद्रव्यशक्तिश्च तिष्ठति ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्येष्ठ होने के कारण वरसंवित् की प्रबलता है, ऐसा कहते है।
क्षणांश से भी जो श्रेष्ठ है उससे ज्येष्ठत्व न्याय की पूर्ति होती है, क्योकि ज्येष्ठ के उत्पत्ति के
समय वह (उसका विरोधी) उत्पन्न नहीं हुआ रहता, इससे वह भलीभाँति बद्धमूल हो जाता है ।
अप्रमाणजन्य की ज्येष्ठता बाध्य होने मेँ कारण है जैसे कि प्रमाण द्वारा दृढ़ीकृत अर्थ में अनपेक्षित
रजतभ्रम ज्ञान की ज्येष्ठता बाध्यता में कारण है यह प्रसिद्ध है । अन्य न्याय शाप की प्रबलता सिद्ध
करने के लिए समर्थ नहीं हे ॥३ ६॥
अतएव जहाँ पर विरुद्ध कर्मो की अथवा वर और शाप का प्रमाणअभ्यासादि साम्य हो वहाँ पर
दोनों का मिश्रित ही फल होता है, ऐसा कहते है।
दूधमिश्रित जल की तरह समान बलवाले वर और शाप के विलास से शुभ ओर अशुभ उभय
कोटिस्थ समानरूप से मिश्रित वस्तु होती है जैसे कि मनुष्य शरीर