Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 47–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verses 47–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 47-49
संस्कृत श्लोक
यथेयं संसृतिर्ब्राह्मी भवतो यद्भविष्यति ।
यथा भानं च दृश्यस्य तदेतत्कथितं मया ॥ ४७ ॥
उत्तिष्ठतं व्रजतमास्पदमह्नि पद्मं भृङ्गाविवाभिमतमाशु विधीयतां स्वम् ।
तिष्ठामि दुःखमलमस्तसमाधिसंस्थं भूयः समाधिमहमङ्ग चिरं विशामि ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे वरो, देह छूटने के बाद ही ये सब लोग अपने घरों में सप्तद्वीपेश्वर बन गये हैं। सब वर
कहेंगे : भगवन्, सात द्वीपवाले भूमण्डल कहाँ हैं और उनके विविध ऐश्वर्य कहाँ हैं ? यहाँ एक ही
भूषीठ सुना और देखा गया है । उससे अतिरिक्त भूषीठ सुनने और देखने में नहीं आया किसी एक
घर के अन्दर वे सात द्वीपवाले भूखण्ड कैसे रह सकते हैं, छोटे से कमलगट्टे के अन्दर बहुत से हाथी
कैसे समा सकते हैं