Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 52–58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verses 52–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 52-58
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
जगत् की स्वप्नतुल्यता का प्रदर्शन करते हुए पूर्वोक्त बात को स्पष्ट करते है ।
मृत्यु के बाद उसी क्षण में शून्यात्मक होता हुआ भी घनाकार यह जगत् ज्यों -का-त्यों स्फुरित
होता है । जहाँ सच्चित्-परमाणु में भी जगत् समा जाता हे वहाँ उस घर के अन्दर सप्तद्वीपा पृथ्वी
स्फुरित होती है, इसमें क्या अनहोनी बात है जो यह जगत् का भान होता है वह तत्त्वतः चित्तत्त्व
ही है । चूँकि जैसे शून्यरूप से आकाश स्फुरित होता है वैसे ही चिन्मात्र ही जगत्रूप से भासित होता
है, इसलिए जगत् कहीं पर मूर्त नहीं है जिससे कि घर के भीतर वह न समा सके । तदनन्तर वरदान
देनेवाले श्रीब्रह्माजी द्वारा यों समझाये गये वे वर पहले कल्पित अपने आधिभौतिक भ्रान्तिमिय शरीरो
का त्यागकर आतिवाहिक शरीरवाले बनकर ब्रह्माजी को प्रणाम कर विरोध न रहने के कारण सब
साथ ही तत् तत् के मन से कल्पित सप्तद्वीप मेँ तत्-तत् देवताओं के गृहो को गये, जिनमें विविध
जन स्फुरित हो रहे थे । वे आठों भाई उस घर में यज्ञ आदि सत्कर्म ओर बन्धुजनो से परिपुष्ट तथा
आठ जगतों के विभाग से ब्रह्मा के आठ दिनों तक आदि राजा स्वायंभुव मनुओं के कुल में सप्तद्वीपों
से युक्त पृथिवी के अधिनायक हो गये । प्रत्येक के मेँ भ्रातृसहित हूँ यो कल्पना करने से अन्योन्य
बन्धु, सबके भिन्न-भिन्न राज्य होने के कारण आधिपत्य के अंश के विषय में अज्ञ, परस्पर एक
दूसरे को राजा न जाननेवाले, अतएव अन्योन्य के अभिमत में हित न कि विरुद्ध चेष्टावाले वे
अन्योन्य के भूमिमण्डल में स्थित हुए