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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 17, 18

संस्कृत श्लोक

परमार्थश्च सर्गश्च पर्यायौ तरुवृक्षवत् । बोधादेतदबोधात्तु द्वैतं दुःखाय केवलम् ॥ १७ ॥ परमार्थो जगच्चेदमेकमित्येव निश्चयः । अध्यात्मशास्त्रबोधेन भवेप्सैषा हि मुक्तता ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

वरों के ऐसा कहने पर क्रोध से झुँझलाये हुए शापों ने, “आप लोगों की सृष्टि सूर्य ने की और हम रुद्रांश से बनाये गये हैं। देवताओं में रद्र सर्वश्रेष्ठ हैं और मुनि (दुर्वासा) रुद्रांश से उत्पन्न हैं” यों वरों से कहकर जैसे पर्वत शिखरों को उद्यत करते हैं वैसे ही वरों के प्रति त्रिशूलाग्र उठायेंगे