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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

कुन्ददन्त उवाच । प्राग्दृष्टं स्मृतिमायाति तत्स्वसंकल्पनान्यतः । भाति प्रथमसर्गे तु कस्य प्राग्दृष्टभासनम् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

जहाँ पर एक काल में भिन्न देश मे भोग्य समान बलवाले वर ओर शाप होते हैं वहाँ पर विपश्वित्‌ उपाख्यान में वर्णित न्याय से उपाधि के विभाग द्वारा एक ही जीव चिति एक ही समय में देहभेद से दो रूप की हो जाती है, ऐसा कहते हैं। अथवा जैसे स्वप्नों में नगरात्मक चिति नगरवासी लोगों के देह-भेद से विभिन्‍न-सी मालूम होती है वैसे ही जीवचिति एक समय में भिन्न देश में भोग्यसमान बली वर और शापों से अपनी द्विरूपता का स्वयं अनुभव करती है॥३ ८॥ श्रीब्रह्माजी के आगे अपनी तात्त्विक बातों का बखानरूप धृष्टता अनुचित है, यह सोचकर कहते हैं : हे प्रभो, जो आपके चरणों के समीप बैठकर आपसे सीखा था उसका आपके सामने ही पुनः पारायण करना धृष्टता का सूचक होने से हमारे अपराध को क्षमा करें अतः आपको नमस्कार है, हम लोग शीघ्र अपने स्थान को जाते हैं