Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
यतो वाचो निवर्तन्ते न निवर्तन्त एव वा ।
विधयः प्रतिषेधाश्च भावाभावदृशस्तथा ॥ २० ॥
अमौनमौनं जीवात्म यत्पाषाणवदासनम् ।
यत्सदेवासदाभासं तद्ब्रह्माभिधमुच्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे शापों, दुष्टता (अनुचितकारिता)
का त्यागकर कार्य का अन्त विचारो । कलह के अन्त में जो कुछ करना हे वही पहले कर लेना चहिये यह
विचार लेना ठीक हे । कलह के अन्त में ब्रह्मलोक में जाकर हमें निर्णय करना ही पड़ेगा इस झगड़े में वही
बात पहले क्यो न कर ली जाय ॥