Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 1–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verses 1–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
कुन्ददन्त उवाच ।
इत्युक्तवानसौ पृष्टः कदम्बतलतापसः ।
सप्तद्वीपा भुवोऽष्टौ ताः कथं भाता गृहेष्विति ॥ १ ॥
कदम्बतापस उवाच ।
चिद्धातुरीदृगेवायं यदेष व्योमरूप्यपि ।
सर्वगो यत्र यत्रास्ते तत्र तत्रात्मनि स्वयम् ॥ २ ॥
आत्मानमित्थं त्रैलोक्यरूपेणान्येन वा निजम् ।
परिपश्यति रूपं स्वमत्यजन्नेव खात्मकम् ॥ ३ ॥
कुन्ददन्त उवाच ।
एकस्मिन्विमले शान्ते शिवे परमकारणे ।
कथं स्वभावसंसिद्धा नानाता वास्तवी स्थिता ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
घर से बाहर निकलना ही संभव नहीं है वह सप्तद्वीपाधिश्वररूप से दिग्विजय कैसे कर सकता है ? जिस
वरदाताओं ने वर दिये वे वर शापों से विपरीत फलदायकता को कैसे प्राप्त हो सकते हैं, शीतल छाया
ग्रीष्म की धूप कैसे बन सकती है ?