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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 31–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verses 31–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 31-32

संस्कृत श्लोक

यथा केशोण्ड्रकं व्योम्नि भाति व्यामलचक्षुषः । तथैवेयं जगद्भान्तिर्भात्यनात्मविदोऽम्बरे ॥ ३१ ॥ यावत्संकल्पितं तावद्यथा संकल्पितं तथा । यथा संकल्पनगरं कचतीदं जगत्तथा ॥ ३२ ॥ संकल्पनगरे यावत्संकल्पसकला स्थितिः । भवत्येवाप्यसद्रूपा सतीवानुभवे स्थिता ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

वर का फल सुखभोगायतन देह विज्ञप्तिमात्र स्फुरण ही है, इसलिए वह विज्ञप्ति ही देहाकार बनकर देश, काल आदि की कल्पनारूप सैकड़ों भ्रमो से तत्‌ तत्‌ भोम्य पदार्थों को देखती है, उनका अनुभव करती हे ओर भक्षणीय वस्तुओं का भक्षण करती हे । शास्त्रीय तपस्याकालिक दृढ़ निश्चय से अपने वश में किये हुए संवित्स्वरूप वरदाता से गृहीत होने के कारण वरकल्पनारूप चिति फलावस्था में जव पूर्णरूप से परिपुष्ट होती है तब अन्तःसारयुक्त वही दुर्जय होती है । शापजनित चिति अन्तःसारयुक्त नहीं होती है