Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 10–11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
एकैव चिद्यथा स्वप्ने सेनायां जनलक्षताम् ।
गतेवाच्छैव कचति तथैवास्याः पदार्थता ॥ १० ॥
पुष्पे पत्रे फले स्तम्भे तरुरेव यथा ततः ।
सर्वं सर्वत्र सर्वात्म परमेव तथाऽपरम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्मो के विरोध का परिहार कहने के लिए उपक्रम करते हैं।
इसी बीच में उनके वे वरशापरूप कर्म फलों के अवश्यम्भावी स्वभाव से एक जगह आकाश में (तत्
तत् चित्तअवच्छिन्न आकाश में) संघटित होंगे। वे कर्म तत् तत् फलप्रद देवतारूप होकर अपने अपने
अनुकूल समूहों से घटित संपुट अलग अलग बनायेंगे। इस प्रकार संपुटरूप हुए वर और शाप अलग-
अलग वर-शाप-शरीरों का निर्माण करेगे