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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, Verses 6–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 184, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 184 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

असत्स्वेषु पदार्थेषु पदार्था इति भान्ति यत् । चित्वं स्वप्नसुषुप्तात्म तत्तस्याच्छं निजं वपुः ॥ ६ ॥ सस्पन्दोऽपि हि निःस्पन्दः पर्वतोऽपि न पर्वतः । यथा स्वप्नेषु चिद्भावः स्वभावोऽर्थगतस्तथा ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

गौरी-आश्रम के तपस्वी ने कहा : हे साधो, इनका क्या असमंजस देखते हो । इसके बाद इनकी जो घटना घटेगी उसे सुनो । उसीसे तुम्हारे सन्देह का समाधान हो जायेगा । आज के दिन से आठवें इसी दिन के प्राप्त होने पर आप दोनों लोग अपने बन्धु-बन्धवों से पूर्ण उस मथुरा प्रदेश में पहुँचेंगे | मथुराप्रदेश में पहुँचकर कुछ काल तक अपने बन्धुवान्धवों के साथ सुखस्थितिवाले आप लोग सुख से रहेंगे