Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 164
एक सौ बासठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तिरसठवाँ सर्ग इन्द्रियों पर विजयप्राप्ति का उपाय तथा अद्वितीय चित् में चित्तावरोध ओर शास्त्राभ्यास इन बोधहेतुओं का वर्णन |
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- Verse 1'इन्द्रियों को जीतकर ज्ञान द्वारा अविद्यापर विजय प्राप्त कीजिये और पुनर्जन्म का निवारण की…
- Verses 2–4उसके सूक्ष्म पदार्थनिरीक्षण में उपयोगी नहीं होता, क्योकि नेत्रज्योति होने पर ही दीपक उपयो…
- Verse 5ऐसी परिस्थिति में चित्त के प्रत्याहार प्रयत्न से अन्दर आकर्षण द्वारा बाह्याकारता का निरोध…
- Verse 6चित्त को इन्द्रियसेना का सेनापति कहते हैं यानी वह इन्द्रियों का स्वामीरूप से संचालक और नि…
- Verses 7–10तब मन की शान्ति का कौन उपाय है ? इस शकापर मन की शान्ति का उपाय बतलाते है। चित्तावच्छिन्न…
- Verse 11इसी प्रकार एकमात्र स्वधर्मनिष्ठता की दढता भी वैराग्यसिद्धि द्वारा इन्द्रियजय की हेतु होती…
- Verse 12स्वधर्मविरुद्ध देहयात्रा हेतु अन्न आदि में इच्छा का त्याग करता हुआ एवं शम और सन्तोष का उप…
- Verse 13जिसका मन अन्दर संवित् में रसिकता और बाहर नीरसता के अभ्यास में कभी निर्वेद को प्राप्त नही…
- Verse 14संवित् का प्रयत्नपूर्वक ब्रह्म में आरोप करने से मन विषयों के पीछे दौड़ने के दुर्व्यसन का…
- Verse 15विवेकवान् महाशय कहा जाता है । वह वासनारूपी तरगों के वेग से संसारसागर में क्लेश नहीं पाता
- Verses 16–20उदार पुरुष इस प्रकार जितेन्द्रिय होकर निरन्तर साधु-सन्तों की संगति और सत्शास्त्रों के अनु…
- Verses 21–22त्वम्", अहम्“ इत्यादि जगत् अविद्यामात्र (भ्रममात्र) ही है । यह मिथ्या होने के कारण स्व…
- Verse 23अभयशून्यता कहाँ प्रसिद्ध हैं ? ऐसा यदि कोई प्रश्न करे, तो उस पर कहते हैं। यहा पर स्वप्नदर…
- Verse 24हे श्रीरामचन्द्रजी, स्वप्नसंवेदनमात्रस्वरूपवाला चिदात्मा स्वप्न में जो जो राज्यादि वैभव ह…
- Verse 25जो-जो कर्ता, कर्म, करण आदि से निरपेक्ष होता है वह सब चिद्घनमात्ररूप मैं ही हूँ। सृष्टि के…
- Verse 26स्वप्न मे अपने मरने की तरह और मरुभूमि मेँ मृगतृष्णा नदी की तरह प्रतीतिवश विद्यमान रहती हु…
- Verses 27–28चिदाकाश ने सृष्टि के आरम्भ में अपने चाकचक्य का (झलक या चमत्कार का) अपने स्वरूप में संकल्प…
- Verse 29इसमें जो यह जीव आदि का स्फुरण होता है, वह भी परमपद ही है क्योकि शून्यता आकाश ही है ओर आवर…
- Verse 30अथवा अवयव-अवयवी भाव की कल्पना के द्वारा जीवादि की ब्रह्मैकता समझनी चाहिये, ऐसा कहते हैं।…
- Verse 31अथवा स्फटिक शिला के अन्दर वन, पर्वत, नदी आदि के आभास की तरह ब्रह्य मे जगत् का आभास है, य…
- Verse 32परमपद में आदि अन्त ओर मध्य की कोई कल्पनाएँ नहीं हे । यह दृश्यरूपा अविद्या परमपदरूप ही है…
- Verses 33–35स्वप्न से जाग्रत् मेँ प्रवेश करता हुआ ओर जाग्रत् से स्वप्न में प्रवेश करता हुआ जीव प्रब…
- Verse 36यह द्वैत ओर अद्वैत तथा "त्वम्" (तुम) “अहम् (मैं) और “इदम् (यह) ऐसी कोई भी कल्पना अविद्…
- Verses 37–38अप्रबुद्ध बालक द्वैत, अद्वैत आदि भेदों से युक्त वाक्यरचना के विलासो से क्रीडा करते हैं, ज…
- Verse 39तब ज्ञानी लोग भी शास्त्रों में द्वैतअद्वैतविवादों की क्यों इच्छा करते हैं ? ऐसा प्रश्न ह…
- Verses 40–42अविद्यारूपी भस्म का संमार्जन होनेपर अधिकारी लोगों का चित्त ब्रह्म में रम जाता हे, प्राण उ…
- Verse 43^सततूयुक्तानाम्* यानी निरन्तर विचार मे निमग्न हुए इस प्रयत्नातिशय की उक्ति के तात्पर्य क…
- Verses 44–45मन का अंकुररूप (मन का संकल्पस्वरूप) राज्यादि जो सुख है, वह भी कोई सुख है ? तत्त्वज्ञान मे…
- Verse 46इस प्रकार का नित्य अपरोक्ष निरतिशयान्दरूप मोक्षपद अतिशय प्रयत्न के बिना कैसे सिद्ध हो सकत…
- Verse 47इसलिए मेने आप लोगों का अभ्यास दृढ़ हो इस बुद्धि से पुनः पुनः प्रकारान्तर से, दूसरी दूसरी…
- Verses 48–50अध्यात्मशास्त्रों से भस्म भी नहीं लगती है, यानी जो पुनः पुनः अभ्यास नहीं करता उसे इसके तर…
- Verse 51जो परमपद इस शास्त्र से प्राप्त होता है वही वेद से भी प्राप्त होता है । इस शास्त्र के ज्ञा…
- Verse 52इस शास्त्र के ज्ञात होनेपर, समझ में आनेपर, वेदान्तो में महर्षि श्रीवेदव्यास आदि द्वारा प्…
- Verse 53मैं यह आप लोगों के उपर कृपा करके कहता हूँ किसी प्रकार के छल-कपट से नहीं कहता हूँ । आप लोग…
- Verse 54विचारे गये इस श्रेष्ठतम शास्त्र से जो बोध उत्पन्न होते हैं उन बोधों से अन्य शास्त्र एेसे…
- Verse 55यह आख्यान काव्य होने के कारण अनुपादेय है यों इसका अनादर कर भोगो में आसक्तबुद्धि वाले अतएव…
- Verse 56हमारे कुल में हमारे पुरखो ने तप और कर्म में ही निष्ठा उपार्जित की, ब्रह्मनिष्ठा का उन्होन…