Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verses 21–22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 21,22
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
त्वम्", अहम्“ इत्यादि जगत्
अविद्यामात्र (भ्रममात्र) ही है । यह मिथ्या होने के कारण स्वतः ही शान्त अतएव केवल शून्यमात्र
शरीरवाला हे, इसलिए चिदाकाश में (अपने तात्त्विक रूप मेँ) ही स्थित हे । चिदाकाश में चित्प्रभा
का ही इस जगत् के रूप में भान होता है । यह चित् जगत्रूपी शून्य से शून्य भी शून्य ही है यह
निश्चय (सिद्धान्त) है