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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अयं सोहमयं चाज्ञः सत्योऽयमिति बुद्धयः । संभवन्ति न तत्त्वज्ञे क्व मेरौ मृगतृष्णिका ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी परिस्थिति में चित्त के प्रत्याहार प्रयत्न से अन्दर आकर्षण द्वारा बाह्याकारता का निरोधकर ब्रह्माकारता के प्रबोधन का अभ्यास करनेपर पंगु बनी हुई इन्द्रियाँ स्वतः जीती जा सकती हैं, ऐसी युक्ति कहते है। चित्त के प्रत्याहार प्रयत्न द्वारा अन्तर्मुख करने से ब्रह्माकारताबोधनरूप चोखे अंकुशों के आघातं से मदोन्मत्त मनरूपी मतंग को जीतकर ही जीव इन्द्रियोपर विजय पा सकता हे, अन्यथा नहीं