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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 31

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अथवा स्फटिक शिला के अन्दर वन, पर्वत, नदी आदि के आभास की तरह ब्रह्य मे जगत्‌ का आभास है, यह समझना चाहिये, ऐसा कहते हैँ । आभासरूप दृश्य शान्त अविनाशी स्वच्छ चिन्मात्ररूप से ही स्थित हे । उसका स्वच्छता स्वभाव ही जगत्‌ के रूप से भासित होता है, इसलिए अपने स्वभावभूत इस दृश्य मेँ क्या विचार किया जाय यानी इसमें द्रेत या अद्वैत का विचार करना व्यर्थ है