Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verses 7–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verses 7–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 7-10
संस्कृत श्लोक
इदं नासीन्न चोत्पन्नं न चास्ति न भविष्यति ।
जगद्ब्रह्मैव सद्रूपमिदमित्थमवस्थितम् ॥ ७ ॥
चिन्नभः काचकच्यं च स्वात्मन्येवावतिष्ठते ।
जगदित्येव तत्तत्र तज्ज्ञानेनैव चेत्यते ॥ ८ ॥
स्वप्नेषु कल्पनपुरेषु यथान्यदस्ति चिन्मात्रमच्छगगनं ननु वर्जयित्वा ।
नो किंचनापि न च रूपमरूपकेषु रूपं तथा जगति संप्रति जाग्रदाख्ये ॥ ९ ॥
पूर्वं किलोद्भवति किंचन नाम नेदं तच्चावभाति तदनादि खमेव चित्त्वात् ।
नो कारणं न सहकारि किलास्ति यत्र तस्मात्स्वयं भवति वस्त्विति केयमुक्तिः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
तब मन की शान्ति का कौन उपाय है ? इस शकापर मन की शान्ति का उपाय बतलाते है।
चित्तावच्छिन्न संविद्रूप जीव को संविदाकाश मेँ (ब्रह्मे) एक करके निज आत्मा में स्थित
पुरुष का मन शरद ऋतु के कुहरे की तरह अपने-आप शान्त हो जाता हे । हे श्रीरामजी, पूर्ववर्णित
जीवसंवित् का जतन के साथ ब्रह्म में एकीकरण से जैसा चित्त शान्त होता है वैसा शान्त तपस्या,
तीर्थसेवन, विद्या, यज्ञानुष्ठान आदि से नहीं होता । जिस जिसका बलात् स्मरण होता है उस उसका
अधिष्ठान ब्रह्मसंवित् में प्रविलापन संवित् से (एकीकरण संवित् से) निश्चय विस्मरण किया जा
सकता है यानी उसके संस्कारों के उच्छेद से पुनः स्मरण के अयोग्य किया जाता है । उक्त उपाय
से भोगहेतु विषयोंपर विजय प्राप्त होती है । निरन्तर अभ्यासरूप प्रयत्न से यदि चित्तवृत्ति विषयरूपी
मांस से ब्रह्म मे कुछ संरोपित हो उस उपाय से तत्त्वज्ञानियों का अनुभवसिद्ध स्वराज्यपद प्राप्त हुआ
ही समझिये