Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जीवाणवो जगत्यन्तश्चिदादित्यांशुमण्डले ।
यत्र तेऽवयवास्तुल्यास्तेनानवयवात्मता ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
'इन्द्रियों को जीतकर ज्ञान द्वारा अविद्यापर विजय प्राप्त कीजिये और पुनर्जन्म का निवारण कीजिये"
यों इन्द्रियजय की आवश्यकता जो श्रीवसिष्टजी ने बतलाई है उसका श्रीरामचन्द्रजी उपाय पूछते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, इन्द्रियोपर विजय पाये बिना यह अज्ञानिता नष्ट नहीं हो
सकती है, इसलिए कृपया बतलाइये कि इन्द्रियोपर किस प्रकार विजय प्राप्त की जा सकती है ?
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ बासठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तिरसठवाँ सर्ग इन्द्रियों पर विजयप्राप्ति का उपाय तथा अद्वितीय चित् में चित्तावरोध ओर शास्त्राभ्यास इन बोधहेतुओं का वर्णन |