Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तस्मात्स्वयं भवति नेह हि कश्चिदादौ ब्रह्मादयोऽज्ञविदिता न च नाम सन्ति ।
व्योमेदमाततमयं स इतः स्वयंभू रित्यादि चिद्गगनमेव चिता विभाति ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार एकमात्र स्वधर्मनिष्ठता की दढता भी वैराग्यसिद्धि द्वारा इन्द्रियजय की हेतु होती है,
ऐसा कहते हैं।
स्व-वर्णाश्रमधर्म के आचरण द्वारा जो पद प्राप्त होता है वही मुझे रुचता है उससे अन्य नहीं,
उसी पद में आप वज्र के समान दृढ़ होइये