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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verses 33–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verses 33–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 33-35

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

स्वप्न से जाग्रत्‌ मेँ प्रवेश करता हुआ ओर जाग्रत्‌ से स्वप्न में प्रवेश करता हुआ जीव प्रबुद्ध हो चाहे अप्रबुद्ध हो एक रूपसे स्थित हे । प्रबोध और अप्रबोध अवस्था में केवल भानरूप से ही वह स्थित है| जाग्रत्‌ ओर स्वप्न में सुषुप्त (अज्ञानावृत आत्मा) ओर तुर्य (शुद्ध आत्मा) भ्रान्तिनिर्मित सर्प के अन्दर अज्ञानरज्जु ओर केवल रज्जु के तुल्य सदा स्थित है, किन्तु प्रबुद्ध पुरुष जाग्रत्‌ और स्वप्न को एक तुर्य (शुद्ध आत्मा ) ही जानता हे तत्त्वज्ञानवान्‌ पुरुष के लिए जाग्रत्‌, स्वप्न ओर सुषुप्ति सबकुछ तुर्य ही है । तत्त्वज्ञानी की अविद्या नहीं है अतः वह द्वैतस्थ होनेपर भी अद्रय ही है