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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verses 2–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

सर्वं प्राप्य परं बोधं वस्तु स्वं रूपमुज्झति । पुनस्तदेकवाक्यत्वान्न किंचिद्वापरं भवेत् ॥ २ ॥ सर्वास्वेवास्ववस्थासु तत्त्वज्ञविषयं तु तत् । परमेवामलं ब्रह्म नान्यत्किंचित्कदाचन ॥ ३ ॥ यच्चातत्त्वज्ञविषयं तज्जानाति स एव तत् । वयं तु विद्मो नाहं त्वं नातत्त्वज्ञं न वस्तु तत् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके सूक्ष्म पदार्थनिरीक्षण में उपयोगी नहीं होता, क्योकि नेत्रज्योति होने पर ही दीपक उपयोगी होता है वैसे ही प्रचुर भोगो मेँ आसक्त हुए, अपने पुरुषार्थ का उत्कर्षं बढाने में संलग्न तथा जीवन के उपायभूत धनदोलत के उपार्जन में दत्तचित्त पुरुष के शास्त्र आदि साधन ब्रह्मसाक्षात्कार में उपयोगी नहीं होते उसी तरह इन्द्रियोपर विजय न की जाय, तो भी वे उपयोगी नहीं होते | इसलिए इन्द्रियोपर विजय प्राप्त करने की अति आवश्यकता हे । इन्द्रियजय में उपयुक्त इस युक्ति को आप आद्योपान्त सुनिये । मुझसे आगे कही जानेवाली इस युक्ति से थोडी भी साधनसम्पत्ति स्वयत्न से मोक्षफलरूप सिद्धि को प्राप्त होती हे । चिन्मात्र पुरुष, को आप चित्त से प्रापित अर्थ का प्रकाशक होने से यानी चित्त के अधीन होने के कारण जीवनायक जानिये । वह जीव अपने अन्दर जिसे चित्तवृत्ति से व्याप्तकर प्रख्यात करता हे, क्षण मेँ तन्मय हो जाता है यानी उसमें आसक्त हो जाता हे