Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verses 16–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verses 16–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 16-20
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
उदार पुरुष इस प्रकार जितेन्द्रिय होकर निरन्तर साधु-सन्तों की संगति और सत्शास्त्रों
के अनुशीलन से जगत् को सत्य ब्रह्मात्र देखता हे । सत्य वस्तु के दर्शन से मरुभूमि में मिथ्यावस्तुओं
में दौड़ने से दु:खदायी को जलज्ञान की तरह संसारभ्रान्ति शान्त हो जाती है । चेत्यभिन्न चिन्मात्र
ही इस जगत्रूप से स्थित है इस प्रकार के सत्यबोधवाले की (यथार्थज्ञानी की) बन्ध-मोक्षदृष्टियाँ
किससे होगी ? जैसे सूर्य की गर्मीवश शोषण द्वारा क्षीण होकर अनाकार (अमूर्त) हुआ जल फिर
बहता नहीं है वैसे ही अकारण (जिसका कोई कारण नहीं है) दृश्य तत्त्वज्ञान से छिन्नमूल होकर फिर
पनपता नहीं है । आकाशमात्ररूपवाला वेदन ही अपनी अविद्यावश "त्वम्" (तुम), "अहम्" (मैं)
इत्यादि रूप धारण करता है, इसलिए अपने में अध्यस्त “अहम् इत्यादिरूप इस जगत् को ज्ञान द्वारा
मिटाकर अध्यस्त से भिन्न अधिष्ठानमात्र हो जाता है