Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 164, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 164 · श्लोक 47
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
इसलिए मेने आप लोगों का अभ्यास दृढ़ हो इस बुद्धि से पुनः पुनः प्रकारान्तर से, दूसरी दूसरी
युक्तियों से ओर कथा, आख्यान आदि के विस्तार से यही एक ही बात बहुत बार कही है । हजारों
पुनरुक्तियों से विस्तार को प्राप्त किये गये इस ग्रन्थ से ओर इस अभ्यास के श्रम से क्या प्रयोजन है यों
अश्रद्धारूप दुर्मति का आश्रय नहीं करना चाहिये । अतिकुशाग्रवुद्धिवाले किसी एक आधको ही अभ्यास
की अपेक्षा नहीं होती लेकिन मन्दबुद्धि तो यों विस्तारपूर्वक बार-बार कहे गये उपदेशवाक्य से भी इस
दुर्बोध आत्मतत्त्व को हृदय में धारण नहीं कर सकता। अतः उसके लिए पुनः पुनः आवृत्तिरूप अभ्यास
आवश्यक हे