Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 132
35 verse-groups
- Verse 1एक सौ तीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ इकतीसवाँ सर्ग वटधाना राजपुत्र की कथा सुनाकर श्रीविश्वामित…
- Verses 2–5महाराज दशरथ के वचन सुनने से श्रीविश्वामित्रजी को वटधाना राजपुत्रो का वृत्तान्त संस्कार उद…
- Verse 6यह पाताल, भूमि आदि चौदह लोकों से बना हुआ महान् लोक (भूवनों की समष्टि) भूलोक के समान ही ग…
- Verse 7यह निराधार महान् लोक जनाधार कैसे है ? इस प्रश्न पर कहते है । जैसे आकाश में टिके शहद से स…
- Verse 8भूगोल के नीचे की ओर के जो अंग हैं और ऊपर की ओर के जो अंग हैं उनमें प्रवेश कर जहाँपर जो जी…
- Verse 9अन्तरिक्ष लोक में बहनेवाली मन्दाकिनी आदि नदियाँ सौरपरिवाररूपी चन्द्र, सूर्य आदि युक्त नक्…
- Verse 10ज्योतिश्चक्र सहित (नक्षत्रमण्डल सहित) पृथ्वी को चारों ओर से घेरकर द्युलोक इसी भूलोक में स…
- Verse 11यदि किसी को शंका हो कि भूगोल के नीचे स्थित आकाश ऊपर कैसे और नीचे के आकाश की अपेक्षा पृथिव…
- Verses 12–15हे राजन्, उस भूगोल के किसी एक भाग में वटधाना नाम के देश अथवा उनके अधिपति हैँ । उनके वंश…
- Verses 16–17हे राजन्, आकाश में रुके हुए गेंद में घूम रही चींटियों की नाई आज भी वे घूमने में व्याकुल…
- Verse 18हे महाराज, तब वे कहते है कि हम लोगों को उद्योग करनेपर भी भूमि का अन्त प्राप्त नहीं हुआ ।…
- Verse 19कथा का उपसंहार कर उसकी प्रकृत मे योजना करते है। यह ब्रह्मा का संकल्पआडम्बर वास्तव में कुछ…
- Verses 20–21संकल्प-कल्यना का अधिष्ठान चित् ही है इसलिए केवल वित् ही तत्त्व है, यह दूसरे ढंग से दृढ़…
- Verses 22–23यह जगत् सृष्टि के आदि में अभावरूप था अतः शून्य ही था, अतः उस समय परमाकाश (ब्रह्माकाश) ही…
- Verses 24–25उनकी दुष्टाद्रष्टरूपता का विवरण करते हैं-दूसरे की अक्षयता दिखलाते है । आकाशात्मक (शून्यरू…
- Verse 26किन्तु शुद्ध विदणु के मध्य मे जगत् अनुभव नहीं है, ऐसा कहते है । आवृत आत्मस्वरूपभूत उक्त…
- Verse 27हे सुनिपुण आशयवाले श्रोताओं, चूँकि परम पद में सकल जगत् अनुभव व्यावर्त्य अन्यरूपा के अप्र…
- Verse 28इस प्रकार शुद्ध चित् के एक होनेपर अपने परमपद से च्युत हुए बिना भी यह जीव द्वैतबुद्धि से…
- Verse 29इस प्रकार वसिष्ठजी द्वारा वर्णित विपश्चित् के वरित की अपनी उक्ति द्वारा पुष्टि कर भास के…
- Verse 30भास ने कहा : हे मुनिवर, मैंने बहुत दृश्य देखे, विना थकावट के बहुत भ्रमण किया तथा बहुत बार…
- Verse 31हे राजन्, उस असीम महाकाश में पहुँचकर विविध शरीरो से बड़े-बड़े सुखों ओर दुःखों का चिरकाल…
- Verses 32–36हे महात्मन्, भगवान् अग्निदेव के वर से दिगन्त देखने के लिए दृढनिश्चय होकर मैंने वर और शा…
- Verse 37मैं पचास वर्ष तक क्रौंच पर्वत की सुवर्णमय गुफाओं में शरभ जाति का मृग हुआ | उक्त मृगावस्था…
- Verse 38तदनन्तर में ब्रह्माजी के वाहन हंस का बच्चा बना । हंस के जन्म में मेने सुमेरु के ऊपर बहनेव…
- Verse 39सौ वर्ष तक मेने क्षीरसागर के तीरस्थित वन के मन्द सुगन्ध शीतल वायु से चंचल नील अलकावलीवाली…
- Verse 40उसके बाद मैं कालंजर पर्वत पर फूले हुए कंजे और घुँघची के वन में सियार की योनि को प्राप्त ह…
- Verses 41–44सियार की योनि से छुटकारा पाने के पश्चात् किसी दूसरे लोक में सन्तानक के (कल्पवृक्ष भेद के…
- Verses 45–47इस प्रकार अपनी जन्मपरम्पराओं के वर्णन के बीच में उसे अकस्मात् आश्वर्यमय कतिपय अन्य वृत्त…
- Verses 48–49हे जीव, जैसे मैं जगत् घटित होने के कारण तुम्हारे लिए विस्मयावह हूँ वैसे यह सब स्तम्भ, घट…
- Verse 50यह युक्तियुक्त नहीं है, क्योकि मुझे अपने देह का सर्वजगतृघटित रूप से अनुभव नहीं होता । यदि…
- Verse 51रत्रीसंवादरूप आश्चर्य का आँखों देखा वर्णन कर भास वैसा ही दूसरा आश्चर्य कहता है । एक समय म…
- Verse 52मैंने उत्पात आदि से कोई वास्ता न रखनेवाले दूसरे बादल आकाश में देखे । गर्जनवश शस्त्रास्त्र…
- Verse 53दूसरी जगह मैंने दूसरा आश्चर्य देखा, वह है इस जगत् में जितने ग्राम-गृह हैं वे सबके सब अन्…
- Verses 54–56अपूर्वं हैं, उनमें अन्य लोकों के व्यवहारो से विलक्षण व्यवहार होते हे
- Verses 57–58जिसमें मेने विहार नहीं किया वह दिशा नहीं है, जो देश मैंने नहीं देखा वह देश नहीं है, जिस क…