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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 50

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यह युक्तियुक्त नहीं है, क्योकि मुझे अपने देह का सर्वजगतृघटित रूप से अनुभव नहीं होता । यदि कहो कि देह के अन्दर चक्षु आदि का प्रवेश न होने से उसमें तुम्हें जगत्‌का दर्शन नहीं होता तो उसमें स्थित वेद, शास्त्र आदि कानों से श्रवण भी नहीं होगा ऐसी मेरी असंभावना का अनुमान कर उसको संभव बतलाने के लिए उसने मुझसे कहा। तुम ओर तुम्हारे सरीखे अन्य प्राणी जिसे अवेदशास्त्र मानते हैं, देहान्तर्गत जगत्‌ मे स्वदेहभवनरूप दीवार के एकदेशरूप कर्णशष्कुलीप्रदेश से नित्य अनाहत नाद स्वतः सुनाई देता ही है, जो सकल वेद शारत्रादि शब्दसामान्य ध्वनि है। उसीके गर्भ में नित्य नैमित्तिक कर्म का तथा शम, दम आदि ज्ञान के साधनों का अवश्य अनुष्ठान करना चाहिये ये सब विधियाँ निहित हैं तथा कलंज (एक पक्षी) का भक्षण नहीं करना चाहिये यह सकल निषेधक वेदशास्त्र उसके अन्दर निहित हैं । उसके श्रवण से ही उसके अन्तर्गत विधि निषेध शास्त्र के समान उसका अर्थभूत जगत्‌ भी देह में है, ऐसी आप संभावना कीजिये, यह भाव है॥ ४ ९॥ उक्त न्याय से खम्भे, घड़े आदि में भी सकल जगत्‌ का अस्तित्व है ऐसी संभावना करनी चाहिये, इस आशय से कहते हैं। जैसे अनाहत नाद शब्दसामान्यस्वभाव है वैसे ही सकल पदार्थ में अनुगत पदार्थसत्ता भी सर्वजगत्‌ घटित सामान्य स्वभाववाली ही है, क्योंकि इस जगत्‌ में प्रसिद्ध दीवार, पर्वत आदि भी ब्रह्मसत्ता रूप ही हैं । दीवार आदि बोलते नहीं अतः अचेतन हे, ऐसी भ्रान्ति नहीं करनी चाहिये, क्योकि वे जैसे स्वप्न आदि में प्रसिद्ध भाषा में बोलते हैं वैसे ही मेरे सम्मुख भी बोलते है । जब अत्यन्त जड़ रूप से प्रख्यात दीवार आदि मेँ सर्वजगद्घटित चेतनता असमंजस (अयुक्त) नहीं है तब प्रायः चेतनरूप आप लोगों के शरीरों मे तो सुतरां असमंजस नहीं हे