Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 41–44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, verses 41–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 41-44
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
सियार की योनि से
छुटकारा पाने के पश्चात् किसी दूसरे लोक में सन्तानक के (कल्पवृक्ष भेद के) ज्ुरमुट से सुशोभित
सह्याचल के शिखर पर कल्पवृक्ष के निकुजगृह में सिद्ध के शाप से एकाकिनी (अकेली) चन्द्रमुखी
अप्सरा के रूप में आधे सत्ययुग तक मैं रहा । उसके उपरान्त मेने सह्याचल के जलप्राय (दलदल) प्रदेश
में उगे हुए कनइल की शाखा के मध्यवर्ती घोंसलों में सदा शब्द करने वाले वाल्मीक नामक पक्षी के रूप
(४) ऐसी प्रसिद्धि है कि शरभ जाति के मृग में पीठ के बल भी चार चरणों से चलने की सामर्थ्य है ।
उस अवस्था में पेट भी पीठ माना जा सकता है इसीलिए यहाँपर जिसकी दो पीठे आठ चरणों से युक्त
हैं ऐसा कहा है ।
में निश्शंक हो सौ वर्ष बिताये । जब मेरे स्त्री पुत्र आदि के साथ ही कनइल का पेड नष्ट हो गया तब
दूरवर्ती लोक में महेनद्रपर्वत पर वियोगजन्य दुःख से अत्यन्त पीडित हुए मैंने अपनी आयु के शेष दिन
अकेले बिताये। इस प्रकार उक्त दो जन्मों के बाद सिद्ध के शाप से छुटकारा पाने पर सिद्ध के ही अनुग्रह
से सिद्धि को प्राप्त हुए मैंने महेन्द्रपर्वत के ही छायायुक्त चन्दनवनं से वेष्टित अन्य शिखर पर लताओं
के झूलों पर फलों की नाई लटक रहीं एक से एक बढ़कर विलासवाली स्तर्यो देखीं । यद्यपि उनका हृदय
सिद्ध पथिको द्वारा हर लिया गया था, तथापि मैंने उनका उपभोग भी किया । तदनन्तर विवेकविहीन
होने से मेरा चित्त अविद्या के अन्तदर्शन के लिए उत्पन्न हुई दुराग्रहरूपी महामारी से विवश था, अतएव
मेरी बुद्धि को ग्लानि हो गयी थी, इस कारण मैंने अन्दर विरक्ति प्राप्तकर महेन्द्र पर्वत के मध्यवर्ती
जलप्राय प्रदेश में तपस्वी बनकर दिन बिताये