Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 12–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, verses 12–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 12-15
संस्कृत श्लोक
आकाशकोशपतनानुभवैकवृत्तेः श्रान्तस्य मे पदमकार्यथ निद्रयान्तः ।
तादृक्सुषुप्तवपुषाथ मयोपलब्धं स्वप्नात्मजाग्रति तदात्मनि तत्र विश्वम् ॥ १२ ॥
भूयो दिगन्तभुवनामरमन्दराद्रिसंसारचञ्चलतया लतयेव पक्षी ।
अक्षीणवातबलया परिचाल्यमानस्तन्मासु तासु पतितो हि जगद्गुहासु ॥ १३ ॥
विषयाशा दृशो यावत्तावद्यातः क्षणादहम् ।
पुनस्तथैव पश्यंस्तु दृश्यं यातः पुनःपुनः ॥ १४ ॥
इति दृश्यमदृश्यं च गम्यं चागम्यमेव च ।
वेगाल्लङ्घयतो देशं मम वर्षगणा गताः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, उस भूगोल के किसी एक भाग में वटधाना नाम के देश अथवा
उनके अधिपति हैँ । उनके वंश में तीन राजकुमार प्राचीन काल में उत्पन्न हुए। वे राजकुमार विपश्चित्
के समान ही दृश्य भूमि आदि जगत् का अन्त कौन होगा ? उसको हम देखेंगे, यों दृढ़ निश्वयकर उसके
दर्शन के लिए घर से निकले । द्वीप और समुद्र के विभाग से फिर जल फिर भूमि इस क्रम से द्वीप और
समुद्र को चिरकाल तक लाँघ रहे मर कर फिर नये शरीर को प्राप्त हुए उनका दीर्घकाल बीत गया।
स्वच्छ गेंद में लगी हुए दीमकों की भाँति भूगोल में निरन्तर घूम रहे वे जगत् के अन्त को न पा सके,
बल्कि उन्हें दूसरे दूसरे देश प्राप्त होते गये