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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verses 22–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 22,23

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यह जगत्‌ सृष्टि के आदि में अभावरूप था अतः शून्य ही था, अतः उस समय परमाकाश (ब्रह्माकाश) ही था यह बात तो बिलकुल निर्विवाद है । और वही स्वयं ब्रह्माकाश इस समय जगत्‌ सा मालूम पडता हे । इस दृष्टि मे प्रलय ओर सर्ग भिन्न नहीं हे । वह चिद्रूप काम, कर्म ओर वासना के अनुसार जैसे-जैसे कल्पना करता है वैसे ही वहॉँपर आसक्त होकर दृष्टादृष्ट-वेद्यावेद्य-जड चिद्रूप अन्योन्य में तादात्म्यअध्यासवाले स्व-संसारों से परे था, वैसे ही आगे भी चिरकाल तक रहेगा