Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 37
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
मैं पचास वर्ष तक
क्रौंच पर्वत की सुवर्णमय गुफाओं में शरभ जाति का मृग हुआ | उक्त मृगावस्था में मेरी पीठ आठ टाँगों
से युक्त थी (५) तथा मरने का समय निकट आनेपर गरज रहे मेघ से जो ओले ओर मेघ की वृदे मेरे
ऊपर गिरी उनके कारण मेघ के साथ लड़ने के लिए मैं पर्वत शिखर से छलांगें भरने लगा। उसी क्लेश
से मैंने आत्महत्या कर डाली ॥ ३ ६॥ तदुपरान्त मुझे विद्याधर योनि प्राप्त हुई । उस योनि में मेने मलयपर्वत
के शिखरपर ओर मन्दराचल पर काले अगरु के पेड़ों की लताओं द्वारा आलिंगित अतएव मन्द सुगन्ध
शीतल वायु के साथ विद्याधरियों के सुरतां मे उनकी विविध कलारूप सुधा का अनुभव किया