Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 132, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 132 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
क्वचिदहं जगतः परिनिर्गतः पतित एकमहार्णवविस्तृते ।
नभसि तत्र निवासिनिभे सितः समयमन्वभवं पतनं तथा ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि किसी को शंका हो कि भूगोल के नीचे स्थित आकाश ऊपर कैसे और नीचे के आकाश की
अपेक्षा पृथिवीतल नीचे की ओर कैसे ? इस पर कहते हैं।
उस पृथिवीतल के नीचे जो पदार्थ घूमते हैं वे उसके चौतर्फा तत्-तत् प्रदेशों में पहुँचते हुए संचार
करते हैं। जिस आकाश में पक्षी आदि उड़ते हुए जाते हैं वह उसके ऊपर कहा जाता है नीचे अथवा
तिरछा नहीं कहा जाता