Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 130
33 verse-groups
- Verse 1हे श्रीरामचन्द्रजी, वह विपश्चित् आज भी तत्त्वज्ञान न होने के कारण उन पूर्वदृष्टो में ही…
- Verses 2–4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : उनमें से एक विपश्चित् चिरकाल से अभ्यस्त वासना से विवश होकर विविध श…
- Verse 5राजा विपश्चित् के अन्त:करण और शरीर का चार प्रकार से विभाग होने पर भी एकरूप वासना का विभा…
- Verse 6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी प्राणी की खूब अभ्यास को प्राप्त हुई वासना देश, क…
- Verse 7वासना की एकता और विभाग मेँ क्या हेतु हैं ? उस पर कहते हैं। देश, काल, कर्म आदि की एकता वास…
- Verse 8इस रीति से ये विपश्चित् एक साथ उत्पन्न विरुद्ध देश, काल आदि में भोग्य वासना के विभाग से…
- Verse 9भ्रान्तिपूर्ण बुद्धिवाले उन तीन विपश्चितो को आज भी अविद्या का अन्त प्राप्त नहीं हुआ । हजा…
- Verse 10ज्ञानरूपी उजाला प्राप्त होने पर वह थोड़े से समय में शान्त हो जाती है, सूर्योदय होनेपर अन्…
- Verses 11–14इस समय पश्चिम विपश्वित् की जिस वृत्तान्त से मुक्ति हुई, उसको पुनः सुनाते है । हे श्रीराम…
- Verse 15प्रस्तुत कथा का उपसंहार करते हैं। इस प्रकार विपश्चितो का चरित्र आदि से अन्त तक सारा का सा…
- Verse 16अविद्या की कल्पना करनेवाले अज्ञातचित् की अनन्तता से अविद्या की अनन्तता है, यों ब्रह्मवत्…
- Verse 17तन्मयी" इस कथन का भी तात्पर्य कहते है। वह ब्रह्म ही अपरिज्ञात होकर शीघ्र मिथ्या, अविद्या…
- Verse 18यदि शंका हो कि 'अविद्या' और ब्रह्म यों भेद होनेपर वही है, यों अभेद कैसे 2 इस पर कहते हैं।…
- Verse 19ज्ञानविहीन उत्तर विपश्चित् को सैकड़ों युगो मे भी अविद्या का अन्त नहीं मिला, ऐसा कहते हैं…
- Verse 20उत्तर विपश्चित् का ब्रह्माण्ड खप्पर के जोड़ के आकाशमार्ग से बाहर निकलना कैसे हुआ ? ब्रह्…
- Verse 21श्रीवसिष्ठजी ब्रह्माण्ड के दो खप्परों के विभाग मे पाषाणोपाख्यानोक्त कारण की याद दिलाते है…
- Verse 22उससे ऊपर का एक भाग ऊपर की ओर बहुत दूर तक चला गया और नीचेवाला भाग नीचे की ओर अत्यन्त दूर त…
- Verse 23जल आदि ब्रह्माण्डआवरण ब्रह्माण्डखप्परों की तरह विभक्त होकर उन्हीं के आधार में स्थित हैं |…
- Verse 24इन ब्रह्माण्डखप्परों के मध्य में अपार (पारिवाररहित) नीला-नीला-सा जो यह दिखाई देता है उसे…
- Verse 25उक्त आकाश में जल आदि आवरणों का स्पर्श नहीं होता है और वे उसमें हैं भी नहीं वह निर्मल जीवश…
- Verse 26अविद्या का आर पार देखने के लिये मोक्ष होने तक उक्त विपश्चित् नक्षत्रमण्डल की तरह आकाशमार…
- Verses 27–29तब तो दृढ़तर पुरुषप्रयत्न के अट्टूट रहने से अविद्या का अन्त उसने क्यों नहीं देखा ? ऐसी यद…
- Verses 30–31श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्वर, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा है तो वे विपश्चित् किस प्रक…
- Verses 32–33श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जिन जगतां मे वे दोनों विपश्चित् स्थित हैं वे जगत् प…
- Verse 34श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे महामते, मृगता को प्राप्त हुआ विपश्चित् जिस जगत् में स्थित ह…
- Verse 35श्रीवसिष्ठजी ने कहा : परब्रह्माकाश में अत्यन्त दूर जाकर मृग बना विपश्चित् जिस जगत् में…
- Verse 36वही यह जगत् आप जानिये जिसमें वह मृग विपश्चित् स्थित है, वही परमाकाश है जिसमें अत्यन्त द…
- Verse 37श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, वह विपश्चित् इसी जगत् से उस दिगन्तदर्शनरूप गति को गया।…
- Verse 38श्रीवसिष्ठजी ने कहा : जैसे अवयवी सदा सकल अवयवो को जानता हे वैसे ही ब्रह्मात्मा में स्थित…
- Verses 39–43अन्य लोक की दृष्टि में जो अत्यन्त अतीत है वह भी ब्रह्मद्ृष्टि से अत्यन्त समीपवर्ती ही है…
- Verses 44–45वह किस प्रकार दूब चरता है ? बुढ़ापे के समान शिथिल ज्ञानवाला वह कब अपने पूर्व विपश्चित्-ज…
- Verse 46श्रीवसिष्ठजी ने कहा : त्रिगर्त देशाधीश्वर ने जो मृग भेट मेँ आपको दिया है वह अजायबघर में व…
- Verses 47–53श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : उस सभा में यह बात सुनकर रामचन्द्रजी के आश्चर्य की सीमा न रही। उन्…