Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
अथ राम उवाचास्य मुने केन विपश्चितः ।
स्यादुपायेन दुःखान्तः प्राक्तनात्मोदयादिति ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, वह विपश्चित् आज भी तत्त्वज्ञान न होने के कारण उन पूर्वदृष्टो में ही
और उनके सदुश अन्य वासनामात्र होने से अत्यन्त सूक्ष्म विराटों के अन्दर प्रसिद्ध जगतां से वनभागों
में मृग के समान अपनी वासना की उत्कटता से बार-बार घूमता है ॥४ ६॥
एक सौ अद्गाईसवाँ सर्ग समाप्त
एक सौ उनतीसवाँ सर्ग
बचे हुए दो विपश्चितो के वृत्तान्त का वर्णन तथा उनमें से
एक की मृगता के अन्त में श्रीरामचन्द्रजी से भेंट का वर्णन ।
एक विपश्चित् भगवान श्रीविष्णु के अनुग्रह से ज्ञान पाकर मुक्त हो गया और दूसरा आज भी
अविद्या में भ्रमण कर रहा है यह सुनकर बचे हुए दो विपश्चितों का समाचार श्रीरामचन्द्रजी श्रीवसिष्ठजी
से पूछते हैं।
चन्द्रलोक में और शाल्मली द्वीप के राज्य में रोके हुए तथा भोगों की असारता को जाननेवाले
उन दो विपश्चितो के (पूर्व और दक्षिण दिशा को प्रस्थित विपश्चितों के) पीछे पूर्वोक्त वृत्त के
अनन्तर आगे दिगन्तदर्शन वरका क्या हाल हुआ ?