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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

श्रीवाल्मीकिरुवाच । इत्युक्त्वा स मुनिस्तत्र वसिष्ठः श्रेष्ठचेष्टितः । उपस्पृश्य यथान्यायं स्वकमण्डलुवारिणा ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा विपश्चित्‌ के अन्त:करण और शरीर का चार प्रकार से विभाग होने पर भी एकरूप वासना का विभाग अथवा अधम और उत्तम फलका भेद संभव नहीं है, यों श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं। हे गुरुवर, चारों विपश्चितों की एक ही वासना जो सदा उचित थी, वह अधम और उत्तम फल देने वाले भेद को कैसे प्राप्त हुई ? दिगन्तदर्शनरूप उत्कट अभिलाषा सबकी एक ही थी फिर भी किसी की मुक्ति हो गई, कोई अविद्या में लगातार चक्कर लगा रहे हैं, तथा कोई मृग बन गया ऐसा भेद कैसे हुआ ? यह आशय है