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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

मुग्धमुग्धकचत्कान्ति हेममन्दिरसुन्दरम् । उत्फुल्लकिंशुकाकारं संध्याम्बुदवदुत्थितम् ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस रीति से ये विपश्चित्‌ एक साथ उत्पन्न विरुद्ध देश, काल आदि में भोग्य वासना के विभाग से उत्पन्न शरीर- भेद से चार होकर रहे । उनमें से आदि दो अविद्या के लिए वासनाओं से आकृष्ट हुए, एक मृग बनकर वासना का शिकार बना ओर एक की मुक्ति हो गई