Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
चक्षुःकनीनिकाकोशे मुकुरे सलिले मणौ ।
प्रतिबिम्ब इवार्काभो भक्तिनाधारपावकः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि 'अविद्या' और ब्रह्म यों भेद होनेपर वही है, यों अभेद कैसे 2 इस पर कहते हैं।
यह भेद भेद नहीं है, क्योंकि यह भेद अविद्यामय ही है ओर अविद्या ब्रह्मरूप ही हे । चिद्भास्य होने
के कारण भी भेद चित् से पृथक नहीं है। वह ब्रह्म ही चिदाभास है, भिन्नता चिद्रूप ही है