Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
कुटीकुड्येषु भग्नेषु प्रतिबिम्ब इवामरः ।
अतिष्ठत्पुरुषस्तत्र पटान्नट इवोद्गतः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
उत्तर विपश्चित् का ब्रह्माण्ड खप्पर के जोड़ के आकाशमार्ग से बाहर निकलना कैसे हुआ ?
ब्रह्माण्डभंग का कोई हेतु कहा नहीं है, ऐसी परिस्थिति में ब्रह्माण्डआकाश का ही सम्भव नहीं है, इस
अभिप्राय से श्रीरामचन्द्रजी आशंका करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्, क्या विपश्चित् को ब्रह्माण्डकपाट ही नहीं मिला। हे वाग्मिवर, उसे
तोड़कर जैसे वह बाहर निकला यह आपने मुझसे क्यों नही कहा ?