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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

अथोपविश्य तत्रैव स भासो ध्यानसंस्थितः । आत्मोदन्तमशेषेण सस्मार प्राक्तनं तनौ ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

इन ब्रह्माण्डखप्परों के मध्य में अपार (पारिवाररहित) नीला-नीला-सा जो यह दिखाई देता है उसे आकाश कहते हैं। आकाश को अपार कहना अन्य भूतों की अपेक्षा विशालता के प्रतिपादन के लिए है। अन्यथा बाह्यआकाशावरण के पूर्वावरण की अपेक्षा दसगुने परिमाण की उक्ति की अनुपपत्ति हो जायेगी । उसके आगे ब्रह्माण्डाकाश का वर्णन भी न हो सकेगा