Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verses 32–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 32,33
संस्कृत श्लोक
दशरथ उवाच ।
अहो बत चिरं कालमालानेनेव दन्तिना ।
वन्येनाविद्यया दुःखमनुभूतं विपश्चिता ॥ ३२ ॥
असम्यग्बोधदुर्दृष्टेरहो नु विषमा गतिः ।
व्योम्न्येव दर्शयत्येषा सर्गाडम्बरसंभ्रमम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी,
जिन जगतां मे वे दोनों विपश्चित् स्थित हैं वे जगत् प्रयत्न से विचार करने पर भी हमारी बुद्धि के विषय
नहीं हुए। हाँ, तीसरा विपश्चित् जहाँपर मृग योनि को प्राप्त होकर स्थित है, वह ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत
अनन्त संसार के साथ संभवतः हमारी बुद्धि के विषय में स्थित हे