Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 130, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 130 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अदृश्यताथ ज्वालायामन्तःकनककान्तिमान् ।
पुरुषः पावनाकारः कान्तावयवसुन्दरः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्या की कल्पना करनेवाले अज्ञातचित् की अनन्तता से अविद्या की अनन्तता है, यों ब्रह्मवत्
(कारणब्रह्म की तरह) इस दृष्टान्त के कथन का तात्पर्य कहते हैँ ।
जो चित् करोड़ों वर्षो तक जहाँपर जाता है वहाँ वहाँ स्वभावतः कुछ न कुछ उसे दिखाई
देता हे